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Friday, December 7, 2012

कतरा कतरा


दास्तां कहते गये कतरा कतरा,
सीतम सहते गये कतरा कतरा,

महेफिले रोशन थी आने से,
चीराग बुज गये कतरा कतरा,

कुछ कमी न थी शानेसौकतमे,
मनसुबे ढह गये कतरा कतरा,

वादे पे उनके नाज था जीसको,
कफन औढ सो गये कतरा कतरा,

मुश्कीलसे सजाया आंखोमे उसे,
आंसु बन बह गये कतरा कतरा,

गुनाह किया था चाहने का उससे,
सजा भोगते ही गये कतरा कतरा,

दस्तुर था समीर भुल जानेका उसका,
पर यादोमें सताते गये कतरा कतरा ।

Thursday, August 18, 2011

जिस मोड़ से गुजरो

ख़्वाबों में आशाओं के रंग बिखरने दो
खुले नयनों में आकाश सिमटने दो
बना ली बहुत सिमाएँ चारों ओर
कल्पनाओं को उन्मुक्त उड़ान अब भरने दो।।

निराशा हताशा की चिता सजने दो
तनहाई को मौन संगीत से भरने दो
अद्भुत सौंदर्य दिखेगा हर तरफ़
इक बार अंदर की गागर तो छलकने दो।।

क्यों ज़िंदगी को अपने से बिछड़ने देते हो
बाहरी चकाचौंध में पागल बन भटकने देते हो
भीतर ही हैं खुली हुई मधुशाला
क्यों नहीं इसी में खुद को बहकने देते हो।।

खुद से खुद को ज़रा बात करने दो
सुप्त ऊर्जा को ज़रा वात बन बहाने दो
मत रोको अपने बचपन को
खुल के हँसों ज़रा उत्पात होने दो।।

फरारी से द्रुत मन के सवार बनो
अट्टालिका में रहकर भी हिम का आकार बनो
जीवन को कर लो इतना उन्नत तेजस्वित
जिस मोड़ से गुज‍रो उसी की पहचान बनो।।

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